विभिन्न सामाजिक संगठनों ने जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की गिरफ़्तारी की आलोचना की है।
आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट की राष्ट्रीय कार्य समिति ने वांगचुक की गिरफ़्तारी को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है। समिति ने यहाँ जारी बयान में कहा कि वांगचुक के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार करना लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। मोदी सरकार को लद्दाख के लोगों के लोकतांत्रिक शांतिपूर्ण आंदोलन पर दमन और उत्पीड़न करने के बजाय लद्दाख को राज्य का दर्जा देने एवं छठी अनुसूची को लागू करने का अपना वादा पूरा करना चाहिए।
राष्ट्रीय अध्यक्ष एस आर दारापुरी की तरफ से जारी बयान में एआईपीएफ ने कहा कि यह सर्वविदित है वांगचुक लद्दाख को राज्य का दर्जा देने एवं छठी अनुसूची को लागू करने का वादा पूरा करने की मांग को लेकर पिछले चार साल से बिल्कुल गाँधीवादी शांतिपूर्ण तरीके से अपना आंदोलन एवं अनशन चला रहे थे। उनसे कई दौर की बातचीत के ज़रिए लद्दाख के लोगों की चिंताओं का समाधान करने से इनकार करने से निराश होकर, लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) और अन्य जन संगठनों ने 15 दिनों तक शांतिपूर्ण भूख हड़ताल की। मोदी सरकार ने उनकी इन मांगों को लेकर कोई भी सकारात्मक रुख नहीं दिखाया। परिणामस्वरूप शांतिपूर्ण आंदोलन की परम्परा के इस इलाके में लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। उसके बाद लगता है कि सरकार ने भाजपा दफ्तर को जलाए जाने की घटना को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया है और उस व्यक्ति पर हमला बोल दिया है जो किसी भी तरह से इसके लिए जिम्मेदार नहीं दिखता। सरकार ने वांगचुक की गिरफ़्तारी अहंकार, क्रोध और प्रतिशोध की भावना से की है जोकि जनता की लोकतान्त्रिक मांगों को दबाने का प्रयास है। उन पर राष्ट्रद्रोह की धारा लगाई गई है। पूरे लद्दाख में इंटरनेट पर पाबंदी लगा दी गई है। हालत इतनी बुरी है कि एक अत्यंत ठंडे क्षेत्र में रहने वाले सोनम वांगचुक को जोधपुर जैसे अत्यंत गर्म स्थान की जेल में रखा गया है। लद्दाख के घटनाक्रम से यह भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है कि मोदी सरकार का 370 को हटाकर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के विभाजन का फैसला पूरे तौर पर विफल साबित हुआ।
आल इंडिया पीपुल्स फ्रन्ट सरकार ने से सोनम वांगचुक को तत्काल रिहा करने, दमन पर रोक लगाने, इंटरनेट समेत लोकतांत्रिक गतिविधियों को चालू करने और लद्दाख की जनता से किए वायदों को पूरा करने की मांग की है।
सिटिज़न्स फ़ॉर डेमोक्रेसी (सीएफडी) लद्दाख, लेह शहर में हुई हिंसा को इस आशंका से देखती है कि कहीं ये देश में बेरोज़गार युवाओं के लिए ट्रेंड न बन जाए। हिंसा से हिंसा बढ़ती है और राजसत्ता के पास हिंसा के बेहतर तरीक़े और साधन होते हैं।
सीएफडी के महासचिव शशि शेखर प्रसाद सिंह के यहाँ जारी बयान के अनुसार लद्दाख के लोगों को राज्य का दर्जा चाहिए और वो चाहते हैं कि इस इलाके को भारत के संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किया जाए, लेकिन सरकार जिस तरह से बात टाल रही है, उसी की वजह से ये सब हो रहा है। सरकार सुरक्षा का हवाला देकर लद्दाख पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहती है। ये तो बेतुकी बात है। आखिर, आर्टिकल 370 के हटने तक लद्दाख जम्मू-कश्मीर राज्य का ही हिस्सा था। ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है जिससे ये साबित हो कि जम्मू-कश्मीर राज्य ने देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए केंद्र सरकार के काम में अड़ंगा डाला हो, ताक़ि लद्दाख को सीधे केंद्र सरकार के नियंत्रण में रखने की ज़रूरत पड़ जाए।
अब सरकार सारा दोष सोनम वांगचुक पर डाल रही है कि उन्होंने हिंसा भड़काई। उन पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही थी और अब उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है ।उनके एनजीओ पर पाबंदियां लगा दी गई है जिसके कारण उनको मिलने वाली सहायता के स्रोत सूख जाएंगे और वो लोगों की जो मदद करते हैं, वो भी रुक जाएगी।
लेकिन ज़्यादातर लोगों को तो यही लग रहा है कि इस इलाके को अलग केंद्र शासित प्रदेश सिर्फ इसलिए बनाया गया है ताकि उद्योगपतियों को ज़मीन देने में आसानी हो। पहले से ही, एक बहुत बड़ा सोलर पार्क बन रहा है; इंडस्ट्री के लिए ज़मीन देने से चरवाहों को अपने चरागाहों की ज़मीन से हाथ धोना पड़ेगा। ज़्यादातर लोगों का गुज़ारा तो पशुपालन से ही चलता है।